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Kanpur : डफरिन अस्पताल के Dr सुधीर कुमार द्विवेदी हुए सम्मानित।

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वाराणसी : उत्तर प्रदेश के वृंदावन के साथ काशी में मनाई जाने वाली होली विश्व प्रसिद्ध है। होली के पर्व से पहले काशी में होने वाली होली के पारंपरिक आयोजन की तैयारी बेहद ही जोरो शोर से की जा रही है। रंगभरी एकादशी पर बाबा श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में होने वाली होली के एक दिन बाद होने वाली महाश्मशान की होली यानी मसाने की होली पर विवाद खड़ा हो गया है।

दरअसल विगत कुछ सालों में धधकती चिताओं के बीच खेले जाने वाली मसाने की होली को लेकर काशी के संतो और विद्वानों ने इसे शास्त्र सम्मत नहीं बताया है। वही दूसरी ओर महाश्मशान पर जलती हुई चिताओं के बीच खेले जाने वाली होली के दौरान महिलाओं को महाश्मशान से दूर रहने की अपील की गई। वही महाश्मशान पर होने वाली होली के दौरान नशा कर हुड़दंग करने वालो को भी कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

क्यों खेली जाती है जलती हुई चिताओं के बीच चिता भस्म की होली

काशी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर रंगभरी एकादशी के दिन से होली का आयोजन शुरू हो जाता है। चिताओं के भस्म से होली खेले जाने के पीछे महाश्मशान पर होली का आयोजन करवाने वाले आयोजक गुलशन कपूर के अनुसार बाबा श्री काशी विश्वनाथ शिवरात्रि के बाद रंगभरी एकादशी को माता गौरा का गौना करवाने के लिए ससुराल जाते है। जहां काशीवासी बाबा श्री काशी विश्वनाथ और माता गौरा के साथ गुलाल से होली खेलते है।

वही रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद भगवान शिव अपने गण ( भूत, पिशाच, आदि) के साथ होली खेलने के लिए महाश्मशान में चिताओं के भस्म से होली खेलते है। ऐसे में मणिकर्णिका घाट पर बाबा मशाननाथ पर गुलाल और चिताओं के भस्म चढ़कर काशी के लोग भगवान शिव के गण के रूप में भस्म से होली खेलते है। गुलशन कपूर की माने तो पहले इस होली को काशी के लोग ही खेलते थे,लेकिन डिजिटल दुनिया में इसका प्रचार -प्रसार ज्यादा होने से बाहर से लोग भी इस अनोखी परंपरा को जानने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचने लगे है और इस अनोखे और पारंपरिक होली में शामिल होने लगे है।

संतो के साथ काशी के विद्वान क्यों कर रहे है विरोध…

वही दूसरी ओर काशी के संत और शास्त्र के जानकार इसे मात्र एक आयोजन बता रहे है और इसका विरोध कर रहे है। काशी विद्वत परिषद और सनातन रक्षक दल के साथ एक मंच पर कई संगठनों ने इस परंपरा को शास्त्र सम्मत न होने का दवा किया हुआ। इस आयोजन को लेकर काशी विद्वत परिषद के महामंत्री रामनारायण द्विवेद ने बताया कि शास्त्र में कही भी धधकती चिताओं के बीच होली खेलने का उल्लेख नहीं है।

अघोरी और नागा साधु महाश्मशान में बाबा मशाननाथ पर गुलाल और भस्म चढ़ाते है। उन्होंने दावा किया कि विगत कुछ सालों में इसे एक आयोजन के रूप में कुछ लोगो ने बना दिया और बाबा मशाननाथ के मंदिर के बाहर जलती हुई चिताओं के बीच भस्म से होली खेलने की परंपरा शुरू कर दिया। वही जो स्थान मातम और मोक्ष का होता है वहां कुछ लोगों के द्वारा डीजे बजाकर भीड़ जुटाई जाने लगी है, जबकि मशाननाथ के मंदिर में होने वाली होली में गृहस्थ जीवन यापन करने वालो के लिए नहीं है। कुछ ऐसे लोग है, जो अपने निजी फायदे के लिए इस आयोजन को परंपरा का नाम दे रहे है। जिसका विरोध काशी का संत समाज और काशी विद्वत परिषद के साथ सनातन धर्म के कई संगठन कर रहे है।

जानिए कब होगा काशी के महाश्मशान पर होली का आयोजन

काशी में दो स्थानों पर श्मशान घाट पर होली का आयोजन होता है। इस बार 10 मार्च को रंगभरी एकादशी के साथ हरिश्चंद्र घाट पर चिता भस्म की होली का आयोजन होगा। इसकी झांकी बाबा कीनाराम आश्रम से निकल हरिश्चन्द्र घाट पहुंचती हुआ। वही काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर 11 मार्च को चिता भस्म की होली का आयोजन किया जाएगा। जबकि 13 मार्च को होलिका दहन और 14 मार्च को होली का पर्व मनाया जाएगा।


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